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वो मेरा पहला हवाई सफर था, भई जाना था दिल्ली, सो अब ट्रेन के चक्कर में कौन पड़े सो हमने भी जल्दी से नेट पर सर्च मारा देखा एयर डेक्कन का टिकट सबसे सस्ता है सो हम जल्दी से पहुंच गए ट्रैवल एजेंट के पास, लेकिन वो भी सामंतवादी निकला बोल दिया कि हम डेक्कन के टिकट नहीं बेचते कैंसलेशन में बहुत ही दिक्कत होती है। आखिर हमने एयर डेक्कन को फोन लगाया तो उधर से कन्या की आवाज़ आई बोली एयरपोर्ट आकर ही टिकट ले लेना, सस्ता पड़ेगा। तो हम एक भी एक झोला (बैग) टांगकर पहुंच गए मुंबई एयरपोर्ट। पता चला बारिश के कारण फ्लाइट लेट है, हमने कहा ठीक है कोई बात नहीं ट्रेन से तो दिल्ली पहुंचने में इतना वक्त लगता ये तो कुछ ही देर की बात है।
आख्रिर वो शुभ घड़ी भी आ ही गई और डेक्कन वाले सबको बस में भरकर टर्मिनल से फ्लाइट तक ले गए, जहाज के नीचे खड़े शख्स ने पहले ही बता दिया भैया सीट नंबर का कोई हिसाब-किताब नहीं है जहां मर्जी आए बैठ जाना। अब अपन तो ठहरे हिंदुस्तानी आदमी, दो-चार लोगों को धक्का देकर जल्दी से एकदम पीछे से दूसरी लाइन की खिड़की वाली सीट पकड़ ली, अब वहां नीचे देखा तो सैफ अली खान पैरों में गिरे थे यानी लेज चिप्स के खाली रैपर पड़े थे, कुछ एक बड़े बिस्किट और चॉकलेट के रैपर भी थे, ये नजारा अपने को तो बहुत अच्छा लगा, भई अपन ठहरे गांव के आदमी, अपने को तो एकदम मध्य प्रदेश राज्य परिवहन की बस जैसा लग रहा था।
तभी एयर होस्टेस आई कुछ ताम-झाम बताया, और फ्लाइट टेक ऑफ के लिए रनवे की तरफ दौड़ पड़ी। भई खिड़की में से तो नजारा ही कुछ और था लेकिन ये टेक ऑफ के पहले का सीन था, फिर धीरे से मुंबई एयरपोर्ट के पास ही वेस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे पर रेंगती गाडि़यां भी अच्छी लगी, फिर ऊपर से मुंबई की लाइफ-लाइन यानी लोकल भी दिखाई दी लेकिन साब फिर तो क्या फ्लाइट ऑलमोस्ट नब्बे डिग्री के एंगल में हवा में लहरा रही थी और नीचे इतना बड़ा समंदर और मैं गरीब सबसे पीछे हिस्से में खिड़की के पास बैठा था बस तभी एक झटके के साथ फ्लाइट में जिधर मैं बैठा था उधर की ही तरफ मुड़ने लगी भैया फिर वो खिड़की तो मुझे मौत की खिड़की नजर आने लगी। अपन ने तो भगवान को प्रार्थना की प्रभु एक बार दिल्ली पहुंचा दो फिर चाहे तो पैदल ही मुंबई आ जाऊंगा लेकिन हवाई जहाज में नहीं बैठैंगे। साब घर से निकलने से लेकर पांच घंटे में मैं दिल्ली पहुंच गया था। यहीं चमत्कार था कैप्टन गोपीनाथ्ा का, मेरे जैसा आदमी भी हवा की सैर करने के बारे में सोच भी सका ये केवल एयर डेक्कन के कारण ही मुमकिन हो पाया। लेकिन अब दारु बेचनेवाले विजय माल्या ने एयर डेक्कन में 26% हिस्सा खरीद लिया है और 20% हिस्से के लिए ओपन ऑफर ला रहे हैं।
मैने सुना हैं कि माल्या अब डेक्कन का मेकओवर करने वाले हैं। भई मेकओवर तो इससे पहले भी हुआ था जस्सी का। ओ जस्सी लुधियाने वाली नहीं सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन की जस्सी जैसी कोई नहीं वाली मोना सिंह यानी जस्सी का। इससे पहले जस्सी दांतों में बड़े-बड़े तार बांधे और हे मोटा सा चश्मा लगाए आती थी और अपने अरमान सर का दिल जीतने की कोशिश करती थी और हां बिजनेस में भी बहुत तेज थी। लेकिन टीवी वालों ने उसका भी मेकओवर कर डाला, उसे सेक्सी और स्टाइलिश जस्सी बना डाला। नई जस्सी ने अरमान सर का दिल तो जीत लिया लेकिन मेरे जैसे लाखों लोगों का दिल टूट गया, मुझे लगा कि भई जिंदगी में मोटे चश्मे वालों का कुछ नहीं होगा, जस्सी जैसे स्टाइलिश बनना ही पड़ेगा। वैसे ही हमारे माल्या साब भी अब मेकओवर की बात कर रहे हैं। हमारे चैनल ने सबसे पहले बड़ी-बड़ी एक्सक्लूसिव न्यूज चलाई ” डेक्कन में नाश्ता-पानी” फिर एक दिन शाम को माल्या साहब पधारे उन्होंने साफ कहा कि सस्ते टिकट के दिन खत्म हो गए हैं। बस ये बात दिल तोड़ने वाली है, भई मुझे नहीं चाहिए नाश्ता-पानी, पानी तो ऐसे भी मैं घर से लेकर निकलता हूं और नाश्ता तो एयरपोर्ट के बाहर से भी मिल सकता है। लेकिन कुल जमा पांच घंटे में मुंबई से दिल्ली पहुंचना ज्यादा जरूरी लगता है। बस माल्या साहब की बातों से लगता है कि अब मेरे हवा में उड़ने के दिन अब पूरे हो गए हैं फिर मुझे अब हवा में उड़ते जहाज को हसरत भरी निगाहों से दूर से ही देखना पड़ेगा, अपनी बीवी के साथ मैं वैष्णो देवी (जम्मू तक) फ्लाइट से नहीं जा सकूंगा, कभी पापा का हवाई जहाज में बैठने का ख्वाब पूरा नहीं कर पाऊंगा। इसीलिए माल्या साहब की मेकओवर की बात मुझे डराती है।
मेरे पहले सफर की कहानी अभी अधूरी है, ये तो मैने बताया ही नहीं कि दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरने से पहले फ्लाइट को एक घंटा हवा में ही चक्कर लगाना पड़ा, मुझे तो पहली फ्लाइट में ताज के दर्शन भी हो गए, एयरपोर्ट पर उतरने की जगह ही नहीं यानी एविएशन की भाषा में इसे ‘कंजेशन‘ कहते हैं। अगर सरकार पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर बना पाती तो एयर डेक्कन जैसे सस्ते किराएवाले जहाज को इतना सारा ईंधन हवा में यूं ही बर्बाद नहीं करना पड़ता और शायद पैसे की कमी से निपटने के लिए हिस्सा भी नहीं बेचना पड़ता। मेरा तो यही कहना है कि नाश्ता-पानी ना दो ना सही, किंगफिशर की तरह एयर मॉडल (किंगफिशर में तो मॉडल ही होती है) ना खड़ी करो ना सही, फ्लाइट में थोड़ा-बहुत कचरा पड़ा रहा तो वो भी चलेगा लेकिन डेक्कन का बिजनेस मॉडल ना बदलो क्योंकि डेक्कन आम आदमी के सपनों को सच करने की कहानी है।



gud piece of writing n nice style. I like the genuineness of this piece. Keep it up, cheers to u.
Comment by dheeraj — जून 18, 2007 @ 5:58 अपराह्न |
आम आदमी की हसरतों और हालात का अच्छे से वर्णन किया आपने। काश मेकाओवर से पहले हम भी एक बार एयर डैक्कन का मजा ले पाते।
Comment by श्रीश शर्मा — जून 26, 2007 @ 7:15 पूर्वाह्न |
gud article…
keep it up. Aam logo ke sapno wala angle aacha laga…. that was very heart toching.
Comment by swati — सितम्बर 19, 2007 @ 4:07 पूर्वाह्न |
in my opinion!!!!! the moral of the story will touch everyones heart,,,,
i think media can show these things to all world, but they are not doing there proper job BEST OF LUCK
Comment by khalesh — अक्टूबर 14, 2007 @ 3:05 अपराह्न |